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Wednesday, September 7, 2016

डायबिटीज टेबलेट

यह गोली मधुमेह ( डायबिटीज ), पीलिया, यकृत के विकार, रक्ताल्पता, कैंसर तथा कुष्ठ आदि रोगों में लाभदायी है | यह कृमि व कफ का नाश करनेवाली, अरुचि, मंदाग्नि, मलावरोध व आंत्रविकारों को हरनेवाली, रक्तशोधक, शोथहर, ज्वरनाशक व पित्तशामक है |

ये आप अपने नजदीकी संत श्री आशारामजी आश्रम या समिति के सेवाकेंद्र से प्राप्त कर सकते है |



       स्रोत – ऋषिप्रसाद - सितम्बर २०१६ से      

दीपावली विद्यार्थी अनुष्ठान शिविर – ३० अक्टूबर से ५ नवम्बर २०१६

“विद्यार्थियों को गुरु-आश्रम में अनुष्ठान हेतु आने का जो अवसर मिलता है, यह बहुत भारी कल्याणकारी अवसर है |” – पूज्य बापूजी

अनुष्ठान के दौरान श्री वासुदेवानंदजी और साध्वी रेखा बहन के प्रवचनों का लाभ मिलेगा | अनुष्ठान शिविर में बच्चों के साथ बड़े भी लाभ ले सकते हैं |

सूचना : ‘बच्चों को अनुष्ठान हेतु अहमदाबाद नहीं लेकर जाना है’ – ऐसी बातें फैलानेवालों से भ्रमित न हों | आश्रम, समितियाँ, बाल संस्कार सेवाधारी व साधक अपने क्षेत्र के मंत्रदीक्षित विद्यार्थियों को इस सुअवसर का लाभ अवश्य दिलवायें |

सम्पर्क : बाल संस्कार विभाग, अहमदाबाद आश्रम, दूरभाष : (०७९) ३९८७७७४९ / ८८.

                                                                          स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से 

भोजन को औषधि बनाने की युक्ति

आप बीमार न हों तो अच्छा है लेकिन बीमार हों और कोई औषधि लें तो दायें हाथ में औषधि ले के २१ बार ‘ॐ नमो नारायणाय’ जपकर ही लें | और बायाँ स्वर चलता हो उस समय औषधि लेने से ज्यादा फायदा होता है | वृद्धों को तो ऐसा ख़ास करना चाहिए | 

हम तो चाहते हैं कि आप भोजन को भी औषधि बनाकर खाओ, जल भी पियो तो उसे औषध बनाकर पियो | भोजन करने या पानी पीने से पहले ‘ॐ नमो नारायणाय....’ २१ बार जपने से दोनों काम हो गये – भगवान की भक्ति की भक्ति हो गयी और औषधि भी बन गयी | भोजन दायाँ स्वर चलता हो तभी या उसे चालू करके करना चाहिए | इससे विशेष लाभ होता है |
                                                              
                                                                       स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से

स्वास्थ्यप्रद सरल घरेलू नुस्खे

उष्णता व पित्त का शमन आदि : कच्चे नारियल की गिरि के २ – ३ टुकड़ों के साथ १ – २ बताशे कुछ दिनों तक रोज खाने से चेहरे एवं त्वचा का रंग निखरता है, उष्णता एवं पित्त का शमन होता है और बाल घने व लम्बे होते हैं |

शरीर का भीतरी दाह : भिगोयी हुई द्राक्ष और मिश्री प्रात: काल खाने से लाभ होता है |

आँखों के आस-पास का कालापन : १ – १ चम्मच मुलतानी मिट्टी, खीरे का रस और आलू का रस मिलाकर आँखों के पास लेप करें |

स्वप्नदोष : १० ग्राम ग्वारपाठे का गुदा, १ ग्राम काली मिर्च का चूर्ण व सेंधा नमक मिला के शुद्ध देशी घी के साथ सेवन करने से लाभ होता है |

खुजली, घमौरियाँ : नारियल-तेल में नींबू का रस समभाग मिलाकर २ – ३ बार लगा देने से लाभ होगा तथा दुष्प्रभाव ( साइड इफेक्ट ) करनेवाली एलोपैथिक दवाइयाँ, ट्यूबों से बचेंगे |   


                                                                           स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से        

गुणों व खनिजों का खजाना : चौलाई

हरी सब्जियों में उच्च स्थान प्राप्त करनेवाली चौलाई एक श्रेष्ठ पथ्यकर तथा अनेक खनिजों का खजाना है | आयुर्वेद के ‘भावप्रकाश निघंटु’ के अनुसार यह हलकी, शीतल, रुक्ष, रुचिकारक, अग्निदीपक एवं मूत्र व मल को निकालनेवाली तथा पित्त, कफ, रक्तविकार व विष को दूर करनेवाली होती है |

चौलाई की मुख्य दो किस्में होती हैं – लाल और हरी | लाल चौलाई ज्यादा गुणकारी होती है |

चौलाई में कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह, विटामिन ‘ए’ व ‘सी’ प्रचुर मात्रा में होते हैं | गर्भिणी तथा स्तनपान करानेवाली माताओं को इसका सेवन अवश्य करना चाहिए | इसमें रेशें होने के कारण यह आँतों में चिपके हुए मल को अलग करती हैं | पुराने कब्ज में भी लाभदायी है | चौलाई रक्त शुद्ध करनेवाली, अरुचि को दूर कर पाचनशक्ति को बढ़ानेवाली, त्वचा के विकार व गर्मी के रोगों में बहुत गुणकारी है |

यह नेत्रों के लिए हितकारी, मातृदुग्धवर्धक एवं रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर आदि स्त्रीरोगों में लाभकारी है | चौलाई की सब्जी खून की कमी, शीतपित्त, रक्तपित्त, बवासीर, पुराना बुखार, संग्रहणी, गठिया, उच्च रक्तचाप, ह्रदयरोगों तथा बाल गिरने आदि बीमारियों में भी लाभदायक है |

चौलाई की भाजी को केवल उबालकर या घी का बघार दे के तैयार करें |

औषधीय प्रयोग

१] शरीर की गर्मी व जलन : चौलाई के ५० मि.ली. रस में मिश्री मिलाकर पीने से खुजली और गर्मी दूर होती है | हाथ-पैर के तलवों व पेशाब की जलन में लाभ होता है |

२] रक्तपित्त : चौलाई का रस शहद के साथ सुबह-शाम पीने से रक्तपित्त में लाभ होता है तथा नाक, गुदा आदि स्थानों से निकलनेवाला खून बंद हो जाता है |

३] नेत्ररोग : आँखों से कम दिखना, आँखे लाल हो जाना, जलन, रात्रि को न दिखाना आदि तकलीफों में चौलाई का रस ५०-६० मि.ली. प्रतिदिन दें अथवा चौलाई को सब्जी के रूप में उपयोग करें |

४] पित्त-विकृति : पित्त-विकृति में चौलाई की सब्जी खाते रहने से बहुत लाभ होता है |
                                                                                     
                                                                        स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से        

इन तिथियों का लाभ लेना न भूलें

२० सितम्बर : मंगलवारी चतुर्थी ( सूर्योदय से दोपहर ११- ५९ तक )

२५ सितम्बर : रविपुष्यामृत योग ( दोपहर २-३७ से २६ सितम्बर सूर्योदय तक )

२६ सितम्बर : इंदिरा एकादशी ( व्रत से बड़े – बड़े पापों का नाश हो जाता है | यह नीच योनियों में पड़े हुए पितरों को भी सद्गति देनेवाली है | इसका माहात्म्य पढ़ने-सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है | - पद्म पुराण )

२ अक्टूबर : पूज्य संत श्री अशारामजी बापू का ५३ वाँ आत्मसाक्षात्कार दिवस

४ अक्टूबर : मंगलवारी चतुर्थी ( दोपहर १२-३५ से ५ अक्टूबर सूर्योदय तक )

११ अक्टूबर : विजयादशमी ( पूरा दिन शुभ मुहूर्त ) विजय मुहूर्त ( दोपहर २-२३ से ३-११ तक ) (संकल्प, शुभारम्भ, नूतन कार्य, सीमोल्लंघन के लिए ), (गुरु-पूजन, अस्त्र-शस्त्र-शमी वृक्ष-आयुध-वाहन पूजन )

१२ अक्टूबर : पापांकुशा एकादशी ( उपवास करने से कभी यम-यातना नहीं प्राप्त होती | यह पापों को हरनेवाला, स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्य, सुंदर स्त्री, धन एवं मित्र देनेवाला व्रत है | इसका उपवास और रात्रि में जागरण माता, पिता व स्त्री के पक्ष की दस – दस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है | )


स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से        

आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, पुष्टि, धन-धान्य देनेवाला : श्राद्ध-कर्म

(श्राद्ध पक्ष : १६ से ३० सितम्बर )
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को ‘पितृ पक्ष’ या ‘महालय पक्ष’ बोलते हैं | आपका एक माह बीतता है तो पितृलोक का एक दिन होता है | साल में एक बार ही श्राद्ध करने से कुल-खानदान के पितरों को तृप्ति हो जाती है |


श्राद्ध क्यों करें ?

गरुड़ पुराण (१०.५७-५९) में आता है कि ‘समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दु:खी नहीं रहता | पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशुधन, सुख, धन और धान्य प्राप्त करता है |

‘हारीत स्मृति’ में लिखा है : 

न तत्र वीरा जायन्ते नारोग्यं न शतायुष: |
न च श्रेयोऽधिगच्छन्ति यत्र श्राद्धं विवर्जितम ||

‘जिनके घर में श्राद्ध नहीं होता उनके कुल-खानदान में वीर पुत्र उत्पन्न नहीं होते, कोई निरोग नहीं रहता | लम्बी आयु नहीं होती और किसी तरह कल्याण नहीं प्राप्त होता ( किसी – न - किसी तरह की झंझट और खटपट बनी रहती है ) |’

महर्षि सुमन्तु ने कहा : “श्राद्ध जैसा कल्याण – मार्ग गृहस्थी के लिए और क्या हो सकता है ! अत: बुद्धिमान मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए |”

श्राद्ध पितृलोक में कैसे पहुँचता है ?

श्राद्ध के दिनों में मंत्र पढकर हाथ में तिल, अक्षत, जल लेकर संकल्प करते हैं तो मंत्र के प्रभाव से पितरों को तृप्ति होती है, उनका अंत:करण प्रसन्न होता है और कुल-खानदान में पवित्र आत्माएँ आती हैं |

‘यहाँ हमने अपने पिता का, पिता के पिता का और उनके कुल-गोत्र का नाम लेकर ब्राह्मण को खीर खिलायी, विधिवत भोजन कराया और वह ब्राह्मण भी दुराचारी, व्यसनी नहीं, सदाचारी है | बाबाजी ! हम श्राद्ध तो यहाँ करें तो पितृलोक में वह कैसे पहुँचेगा ?’

जैसे मनीऑर्डर करते हैं और सही पता लिखा होता है तो मनीऑर्डर पहुँचता है, ऐसे ही जिसका श्राद्ध करते हो उसका और उसके कुल-गोत्र का नाम लेकर तर्पण करते हो कि ‘आज हम इनके निमित्त श्राद्ध करते हैं’ तो उन तक पहुँचता है | देवताओं व पितरों के पास यह शक्ति होती है कि दूर होते हुए भी हमारे भाव और संकल्प स्वीकार करके वे तृप्त हो जाते हैं | मंत्र और सूर्य की किरणों के द्वारा तथा ईश्वर की नियति के अनुसार वह आंशिक सूक्ष्म भाग उनको पहुँचता है |

‘महाराज ! यहाँ खिलायें और वहाँ कैसे मिलता हैं ?’

भारत में रूपये जमा करा दें तो अमेरिका में डॉलर और इंग्लैंड में पाउंड होकर मिलते हैं | जब यह मानवीय सरकार, वेतन लेनेवाले ये कर्मचारी तुम्हारी मुद्रा ( करंसी ) बदल सकते हैं तो ईश्वर की प्रसन्नता के लिए जो प्रकृति काम करती है, वह ऐसी व्यवस्था कर दे तो इसमें ईश्वर व प्रकृति के लिए क्या बड़ी बात है ! आपको इस बात में संदेह नहीं करना चाहिए |

जैसी भावना वैसा फल

देव, पितर, ऋषि, मुनि आदि सभीमें भगवान की चेतना है | निष्काम भाव से उनको तृप्ति कराने से भगवान में प्रीति होगी | सकाम भाव से उनको तृप्ति कराने से कुल – खानदान में अच्छी आत्माएँ आयेंगी | भगवान में ५ हजार से भी अधिक वर्ष पहले कहा था “

यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रता: |
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ||

‘देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजनेवाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करनेवाले भक्त मूझको ही प्राप्त होते हैं | इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता |’ ( गीता : ९.२५ )

प्रतिमा, मंत्र, तीर्थ, देवता एवं गुरु में जिसकी जैसी बुद्धि, भावना होती है, उसे वैसा फल मिलता है | पितृलोक में जाने की इच्छा से पूजन करता है तो मरने के बाद पितृलोक में जायेगा लेकिन पितरों की भलाई के लिए निष्काम भाव से, कर्तव्यबुद्धि में, भगवान की प्रसन्नता के लिए करता है तो ह्रदय प्रसन्न होकर उसके ह्रदय में भगवदरस तो आयेगा, तडप बढ़ी तो साकार-निराकार का साक्षात्कार करने में भी सफल होगा |

बहुत-प्रेत की सदगति के लिए कुछ कर लें तो ठीक है लेकिन ‘बहुत-प्रेत मुझे यह दे दें’ ऐसी कामना की और उनके प्रति स्थायी श्रध्दा और चिंतन हो गया तो भूतानि यान्ति भूतेज्या....‘भूतों को पूजनेवाले ( मरने के बाद ) भूतों को प्राप्त होते हैं |’ ( गीता ल ९.२५ )

श्राद्ध फलित होने का आसान प्रयोग

स्वधा देवी पितरों को तृप्त करने में सक्षम है | तो उसी देवी के लिए यह मंत्र उच्चारण करना है | श्राद्ध करते समय यह मंत्र ३ बार बोलने से श्राद्ध फलित होता है :

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा |

जो जाने-अनजाने रह गये हों, जिनकी मृत्यु की तिथि का पता न हो, उनका भी श्राद्ध-तर्पण सर्वपित्री अमावस्या को होता है |

‘सामूहिक श्राद्ध’ का लाभ लें

सर्वपित्री दर्श अमावस्या ( ३० सितम्बर २०१६ ) के दिन विभिन्न स्थानों के संत श्री आशारामजी आश्रमों में ‘सामूहिक श्राद्ध’ का आयोजन होता है, जिसमें आप सहभागी हो सकते हैं | इस हेतु अपने नजदीकी आश्रम में २३ सितम्बर तक पंजीकरण करा लें | अधिक जानकारी हेतु पहले की अपने नजदीकी आश्रम से सम्पर्क कर लें | अगर खर्चे की परवाह न हो तो अपने घर में भी श्राद्ध करा सकते हैं |
                                                                                         
                                                                         स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से        

आराधना, उपवास और विश्रांति का सुवर्णकाल – नवरात्रि : १ से १० अक्टूबर

‘श्रीमद देवी भागवत’ के तीसरे स्कंध में महर्षि वेदव्यासजी जनमेजय को नवरात्रों का माहात्म्य बताते हुए कहते हैं :  ६ – ६ मास में नवरात्रि आती है | शारदीय नवरात्र रावण-वध की तिथि के पहले आते हैं और दूसरे नवरात्र आते हैं वसंत ऋतू में रामजी के प्राकट्य के पहले | ये दोनों ऋतुएँ बड़ी क्रूर हैं | ये रोग उत्पन्न करनेवाली हैं | इन दिनों में व्यक्ति अगर नवरात्रि का व्रत और उपवास नहीं करता तो वह आगे चल के बड़ी – बड़ी बीमारियों का शिकार हो सकता है अथवा अभी भी बीमारियों में वह भुन जायेगा | अगर नवरात्रि व्रत रखना है, भगवती की आराधना करता है तो आराधना की पुण्याई व प्रसन्नता से मनोरथ भी पुरे होते हैं और शरीर में जो विजातीय द्रव्य हैं, उपवास और विश्रांति उन रोगकारक द्रव्यों को भस्म कर देती है |

नवरात्रि के उपवास से शरीर के जीर्ण – शीर्ण रोग और लानेवाले कण ये सब नष्ट हो जाते हैं, पाप दूर होते हैं, मन प्रसन्न होता है, बुद्धि का औदार्य व तितिक्षा का गुण बढ़ता है और नारकीय योनियों से छुटकारा मिलता है | ९ दिन के नवरात्रि व्रत या उपवास नहीं रख सकते तो भैया ! ६ दिन, ५ दिन, नहीं तो अंतिम ३ दिन कड़क नियम पालन करते हुए उपवास रखें तो भी ९ दिन के नवरात्रि का फल प्राप्त कर सकते हैं |


स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से

आरोग्य व पुष्टि देनेवाली खीर

शरद पूनम ( १५ अक्टूबर ) की रात को आप जितना दूध उतना पानी मिलाकर आग पर रखो और खीर बनाने के लिए उसमें यथायोग्य चावल तथा शक्कर या मिश्री डालो | पानी बाष्पीभूत हो जाय, केवल दूध और चावल बचे, बस खीर बन गयी | जो दूध को जलाकर तथा रात को बादाम, पिस्ता आदि डाल के खीर खाते हैं उनको तो बीमारियाँ का सामना करना पड़ता है | उस खीर को महीन सूती कपड़े, चलनी या जाली से अच्छी तरह ढककर चन्द्रमा की किरणों में पुष्ट होने के लिए रात्रि ९ से १२ बजे तक रख दिया | बाद में जब खीर खायें तो पहले उसे देखते हुए २१ बार ‘ॐ नमो नारायणाय |’ जप कर लें तो वह औषधि बन जायेगी | इससे वर्षभर आपकी रोगप्रतिकारक शक्ति की सुरक्षा व प्रसन्नता बनी रहेगी |

इस रात को हजार काम छोडकर कम-से-कम १५ मिनट चन्द्रमा की किरणों का फायदा लेना, ज्यादा लो तो हरकत नहीं | छत या मैदान में विद्युत् का कुचालक आसन बिछाकर चन्द्रमा को एकटक देखना | अगर मौज पड़े तो आप लेट भी सकते हैं | श्वासोच्छ्वास के साथ भगवन्नाम और शांति को भरते जायें, नि:संकल्प नारायण में विश्रांति पायें |


स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से 

पाप – ताप मिटाने का सरल उपाय

मुसलमान ५ वक्त की नमाज पढ़ते हैं और हिन्दुओं को ३ समय संध्या करने का विधान है | जब से हिन्दू संध्या भूल गये, तब से बीमारियाँ, अशांति और पातक बढ़ गये | मुसलमान लोग नमाज पढ़ने में इतना विश्वास रखते हैं कि वे चालु दफ्तर में से भी समय निकालकर नमाज पढ़ने चले जाते हैं जबकि हम लोग आज पश्चिम के मैले कल्चर तथा नश्वर संसार की नश्वर वस्तुओं को प्राप्त करने की होड़-दौड़ में संध्या करना बंद कर चुके हैं या भूल चुके हैं | शायद ही २ – ३ प्रतिशत लोग नियमित रूप से संध्या करते होंगे |

त्रिकाल संध्या इसीलिए करवायी जाती थी और लोग करते थे कि सुबह की संध्या में ध्यान, प्राणायाम, जप, आचमन, तर्पण, मुद्राएँ आदि जो किया जाता है वह तन – मन के स्वास्थ्य की रक्षा करता है | रात्रि में अनजाने में हुए दोष सुबह की संध्या से दूर होते हैं | सुबह से दोपहर तक कहीं इधर – उधर मन या तन भटक गया तो वे दोष दोपहर की संध्या से और दोपहर के बाद अनजाने में हुए दोष शाम की संध्या करने से नष्ट हो जाते हैं तथा अंत:करण पवित्र होने लगता है | इसीलिए ऋषि-मुनियों ने त्रिकाल संध्या की व्यवस्था की थी |

आजकल लोग संध्या करना भूल गये हैं जिससे जीवन में तमस बढ़ गया है और कई लोग पदार्थ-संग्रह के, निद्रा के सुख में लगे हैं | ऐसा करके वे अपनी जीवनशक्ति को नष्ट कर डालते हैं |
आप इतना तो अवश्य कर सकते हैं –

आप लोग जहाँ भी रहें, त्रिकाल संध्या के समय हाथ-पैर धोकर तीन चुल्लू पानी पी के ( आचमन करके ) संध्या में बैठे और त्रिबंध प्राणायाम करें | अपने इष्टमंत्र, गुरुमंत्र का जप करें, २ – ५ मिनट शांत होकर फिर श्वासोच्छ्वास की गिनती करें और ध्यान करें तो बहुत अच्छा | त्रिकाल न कर सकें तो द्विकाल संध्या अवश्य करें |

लम्बा श्वास लें और हरिनाम का गुंजन करें | खूब गहरा श्वास लें नाभि तक और भीतर करीब २० सेकंड रोक सकें तो अच्छा है, फिर ओऽऽ....म.... इस प्रकार दीर्घ प्रणव का जप करें | ऐसा १०-१५ मिनट करें | कम समय में जल्दी उपासना सफल हो, जल्दी आनंद उभरे, जल्दी आत्मानंद का रस आये और बाहर का आकर्षण मिटे, यह ऐसा प्रयोग है और कहीं भी कर सकते हो, सबके लिए है, बहुत लाभ होगा | अगर निश्चित समय पर निश्चित जगह पर करो तो अच्छा है, विशेष लाभ होगा | फिर बैठे हैं.....श्वास अंदर गया तो या राम, बाहर आया तो एक..... अंदर गया तो शांति या आनंद, बाहर आया तो दो....श्वास अंदर गया तो आरोग्यता, बाहर गया तो तीन....इस प्रकार अगर ५० की गिनती बिना भूले रोज कर लो तो २ – ४ दिन में ही आपको फर्क महसूस होगा कि ‘हाँ, कुछ तो है |’ अगर ५० की गिनती में मन गलती कर दे तो फिर से शुरू से गिनो | मन को कहो, ’५० तक बिना गलती के गिनेगा तब उठने दूँगा |’ मन कुछ अंश में वश भी होने लगेगा, फिर ६०, ७०.... बढ़ते हुए १०८ तक की गिनती का नियम बना लो | १ मिनट में १३ श्वास चलते हैं तो १०८ की गिनती में १० मिनट भी नहीं चाहिए लेकिन फायदा बहुत होगा | घंटोंभर क्लबों में जाने की जगह ८ - १० मिनट का यह प्रयोग करें तो बहुत ज्यादा लाभ होगा |’

  
स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से 

त्रिकाल संध्या – भाग २

त्रिकाल संध्या से लाभ –

पूज्य बापूजी त्रिकाल संध्या से होनेवाले लाभों को बताते हुए कहते हैं कि  “त्रिकाल संध्या माने ह्र्द्यरुपी घर में तीन बार साफ-सफाई | इससे बहुत फायदा होता है |

त्रिकाल संध्या करने से –

१] अपमृत्यु आदि से रक्षा होती है और कुल में दुष्ट आत्माएँ, माता-पिता को सतानेवाली आत्माएँ नहीं आतीं |

२] किसीके सामने हाथ फैलाने का दिन नहीं आता | रोजी – रोटी की चिंता नहीं सताती |

३] व्यक्ति का चित्त शीघ्र निर्दोष एवं पवित्र हो जाता है | उसका तन तंदुरुस्त और मन प्रसन्न रहता है  तथा उसमें मंद व तीव्र प्रारब्ध को परिवर्तित करने का सामर्थ्य आ जाता है | वह तरतीव्र प्रारब्ध के उपभोग में सम एवं प्रसन्न रहता है | उसको दुःख, शोक, ‘हाय-हाय’ या चिंता अधिक नहीं दबा सकती |

४] त्रिकाल संध्या करनेवाली पुण्यशीला बहनें और पुण्यात्मा भाई अपने कुटुम्बियों एवं बच्चों को भी तेजस्विता प्रदान कर सकते हैं |

५] त्रिकाल संध्या करनेवाले माता – पिता के बच्चे दूसरे बच्चों की अपेक्षा कुछ विशेष योग्यतावाले होने की सम्भावना अधिक होती है |

६] चित्त आसक्तियों में अधिक नहीं डूबता | उन भाग्यशालियों के संसार-बंधन ढीले पड़ने लगते हैं |

७] ईश्वर – प्रसाद पचाने का सामर्थ्य आ जाता है |

८] मन पापों की ओर उन्मुख नहीं होता तथा पुण्यपुंज बढ़ते ही जाते हैं |

९] ह्रदय और फेफड़े स्वच्छ व शुद्ध होने लगते हैं |

१०] ह्रदय में भगवन्नाम, भगवदभाव अनन्य भाव से प्रकट होता है तथा वह साधक सुलभता से अपने परमेश्वर को, सोऽहम्  स्वभाव को, अपने आत्म-परमात्मरस  को यही अनुभव कर लेता है |

११] जैसे आत्मज्ञानी महापुरुष का चित्त आकाशवत व्यापक होता है, वैसे ही उत्तम प्रकार से त्रिकाल संध्या और आत्मज्ञान का विचार करनेवाले साधक का चित्त विशाल होंते – होते सर्वव्यापी चिदाकाशमय होने लगता है |
ऐसे महाभाग्यशाली साधक-साधिकाओं के प्राण लोक – लोकांतर में भटकने नहीं जाते | उनके प्राण तो समष्टि प्राण में मिल जाते हैं और वे विदेहमुक्त दशा का अनुभव करते हैं |

१२] जैसे पापी मनुष्य को सर्वत्र अशांति और दुःख ही मिलता है, वैसे ही त्रिकाल संध्या करनेवाले साधक को सर्वत्र शांति, प्रसन्नता, प्रेम तथा आनंद का अनुभव होता है |

१३] जैसे सूर्य को रात्रि की मुलाकात नहीं होती, वैसे ही त्रिकाल संध्या करनेवाले में दुश्चरित्रता टिक नहीं पाती |

१४] जैसे गारुड़ मंत्र से सर्प भाग जाते हैं, वैसे ही गुरुमंत्र से पाप भाग जाते हैं और त्रिकाल संध्या करनेवाले शिष्य के जन्म-जन्मान्तर के कल्मष, पाप – ताप जलकर भस्म हो जाते हैं |
आज के युग में हाथ में जल लेकर सूर्यनारायण को अर्घ्य देने से भी अच्छा साधन मानसिक संध्या करना है | इसलिए जहाँ भी रहें, तीनों समय थोड़े – से जल से आचमन करके त्रिबंध प्राणायाम करते हुए संध्या आरम्भ कर देनी चाहिए तथा प्राणायाम के दौरान अपने इष्टमंत्र, गुरुमंत्र का जप करना चाहिए |

१५] त्रिकाल संध्या व त्रिकाल प्राणायाम करने से थोड़े ही सप्ताह में अंत:करण शुद्ध हो जाता है | प्राणायाम, जप, ध्यान से जिनका अंत:करण शुद्ध हो जाता है उन्हींको ब्रह्मज्ञान का रंग जल्दी लगता है |


   स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से        

Thursday, August 25, 2016

पित्तजन्य विकारों में उपयोगी घरेलू उपचार

शरद ऋतू (२२ अगस्त से २१ अक्टूबर तक) में पित्त कुपित व जठराग्नि मंद रहती है, जिससे पित्त-प्रकोपजन्य अनेक व्याधियाँ उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है | इनके शमन के लिए कुछ घरेलू उपचार दिये जा रहे हैं |

उलटी : पित्त – प्रकोप से होनेवाली मिचली या उलटी में आँवला रस में शहद मिला के चटायें |

पित्तजनित सिरदर्द : आँवले के चूर्ण में घी व मिश्री मिलाकर लें अथवा ताजे आँवलों के रस में मिश्री मिला के लें | ( सिरदर्द के साथ जी मिचलाना, जलन आदि पित्त के कारण होनेवाले सिरदर्द के लक्षण हैं | )

अम्लपित्त : २ ग्राम छोटी हरड का चूर्ण शहद अथवा गुड़ में मिला के प्रतिदिन शाम को भोजन के बाद १५ दिन तक लेना लाभदायी है |

जलन : काली द्राक्ष रात में भिगोयें | दूसरे दिन सुबह उसे मसल के छान लें | उसमें पिसा जीरा व मिश्री डाल के पीने से पित्त का दाह मिटता है |


स्त्रोत - लोककल्याण सेतु – अगस्त २०१६ से