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Sunday, December 6, 2015

दालचीनी – अमृत औषधि


दालचीनी उष्ण, सुगंधित, पाचक, स्फूर्तिदायक, रक्तशोधक, वीर्यवर्धक व मूत्रल है | यह वायु व कफ का शमन कर उनसे उत्पन्न होनेवाले अनेक रोगों को दूर करती है |

यह श्वेत रक्तकणों की वृद्धि कर रोगप्रतिकारक शक्ति बढाती है | बवासीर, कृमि, खुजली, राजयक्ष्मा (टी.बी.), काला ज्वर, इन्फ्लूएंजा (एक प्रकार का शीतप्रधान संक्रामक ज्वर), मूत्राशय के रोग, टाइफायड, ह्रदयरोग, कैंसर, पेट के रोग आदि में यह लाभकारी है | रोगाणुनाशक गुण के कारण संक्रामक बीमारियों की यह विशेष औषधि है |

दालचीनी – शहद योग
दालचीनी और शुद्ध शहद का मिश्रण तो सोने पर सुहागे जैसा है | बड़े-बड़े रोगों का इलाज इसके द्वारा आसानी से किया जा सकता है |

पेट के रोग व सर्दी-खाँसी: १ ग्राम (एक चने जितनी मात्रा) दालचीनी चूर्ण में १ चम्मच शहद मिलाकर दिन में १ – २ बार चाटने से मंदाग्नि, अजीर्ण, पेट की वायु, संग्रहणी रोग, अफरा और सर्दी-खाँसी में लाभ होता है |


संधिवात : २ चम्मच शहद और १ ग्राम दालचीनी चूर्ण गुनगुने पानी से सुबह-शाम लें |

मोटापा : १ ग्राम दालचीनी चूर्ण १ गिलास पानी में उबालें, गुनगुना होने और १ चम्मच शहद मिलाकर पियें | यह प्रयोग प्रात: व सोने से पहले करें | गर्मियों में यह प्रयोग केवल एक बार सुबह करें |

दालचीनी के कुछ अन्य प्रयोग

ह्रदयरोग : एक ग्राम दालचीनी चूर्ण २०० मि.ली. पानी में धीमी आँच पर उबाले | १०० मि.ली. पानी शेष रहने पर उसे छानकर पी लें | इसे रोज सुबह लेने से कोलेस्ट्राँल की अतिरिक्त मात्रा घटती है | गर्म प्रकृतिवाले लोग एवं ग्रीष्म ऋतू में इसका पानी दूध मिलाकर उपयोग कर सकते हैं | इस प्रयोग से रक्त की शुद्धि होती है एवं ह्रदय को बल प्राप्त होता है |

कब्ज : ५ ग्राम हरड चूर्ण में १ ग्राम दालचीनी चूर्ण मिलाकर रात्रि को सोने से पहले गुनगुने पानी के साथ लेने से कब्ज दूर होता है |

मुँहासे : दालचीनी चूर्ण में नींबू-रस मिलाकर लगाने से मुँहासे व काले धब्बे दूर होते है |

स्वरभंग, खाँसी व मुँह की बदबू: दालचीनी का छोटा-सा टुकड़ा चूसने से स्वरभंग (गला बैठना) की विकृति नष्ट होती है व आवाज खुलती है | इससे खाँसी का प्रकोप शांत होता है | मुँह की बदबू दूर होती है, मसूड़े मजबूत बनते है और तोतलेपन में भी लाभ होता है |

सावधानियाँ : गर्भवती महिलाओं के लिए दालचीनी लेना निषिद्ध है | इसकी अधिक मात्रा लेने से पित्त (उष्ण) प्रक्रुतिवालों को सिरदर्द होता है | अत्यधिक मात्रा में या दीर्घकाल तक इसका सेवन करना हानिकारक है |

बल्य और पुष्टिकारक अन्य प्रयोग

  • १००-१०० ग्राम सफेद मूसली, अश्वगंधा, विधारा और मिश्री –सबको बारीक पीसकर मिला के रख लें | ५- ७ ग्राम मिश्रण सुबह खाली पेट गुनगुने मीठे दूध के साथ लें | इससे शरीर पुष्ट व बलवान बनता है |
  • २ - ४ बादाम रात को पानी में भिगोकर सुबह छिलके निकाल के पत्थर पर घिस लें या पीस लें | उसमें १०-१० ग्राम शहद व मिश्री मिलाकर सुबह चाटने से बल-वीर्य में वृद्धि होती है |


     स्त्रोत - लोककल्याण सेतु – दिसम्बर २०१५ से

Saturday, November 7, 2015

गर्भपात पाप – निवृत्ति व शुद्धि हेतु

अपने ही बच्चे की गर्भ में नृशंस हत्या करवाने से शरीर रोगों का घर बनता है और परिवार कलह, अशांति एवं दुःख की भीषण ज्वालाओं में झुलसने लगता है | प्रसवकाल में माँ के शरीर को जितना खतरा होता है, उससे दुगना खतरा उसे गर्भपात करवाने से होता है |

पराशर स्मृति (४.२०) में आता है :    

यत्पापं ब्रह्महत्यायां द्विगुणं गर्भपातने |

‘ब्रह्महत्या से जो पाप लगता है, उससे दुगना पाप गर्भपात  करने से लगता है |’

जिनसे जाने – अनजाने में यह अपराध हो चूका है, उनके लिए ‘स्कंद पुराण’ में प्रायश्चित की विधि इसप्रकार बतायी गयी है :

‘प्रणव और व्याह्रति ( ॐ भू:, ॐ भुव:, ॐ स्व:, ॐ मह:, ॐ जन:, ॐ तप:, ॐ सत्यम ) के साथ किये हुए १६ प्राणायाम यदि प्रतिदिन होते रहें तो एक मास में वे भ्रूणहत्या करनेवाले पापी को भी पवित्र कर देते हैं ( बशर्ते दुबारा यह पाप न करें ) |’

पहले दिन ५ प्राणायाम से प्रारम्भ करे | रोज एक – एक बढाते हुए १६ तक पहुँचे, फिर प्रतिदिन १६ प्राणायाम एक मास तक करे | भगवान को इस पाप – निवृत्ति व शुद्धि के लिए प्रार्थना करे |


स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – नवम्बर २०१५ से


कटिचक्रासन

इस आसन के अभ्यास में कमर को चक्र के समान बार – बार दायें – बायें घुमाया जाता है इसलिए इसका नाम ‘कटिचक्रासन’ हैं |

लाभ : १) नियमित अभ्यास से कमर पतली तथा सीना चौड़ा होता है |

२) कब्ज की शिकायत दूर होती है |

३) कमर को बहुत बल मिलता है | पसलियों में लचीलापन आ जाता है |

४) गला, पेट, पीठ, कंधों तथा जंघाओं को पर्याप्त बल मिलता है |

५) ठिंगने  व्यक्तियों को इस आसन का अभ्यास अवश्य करना चाहिए |

विधि : दोनों पैरों में एक फुट का अंतर रखकर खड़े हो जायें | अब दोनों हाथों को छाती के सामने पृथ्वी के समानांतर फैलाकर बायीं तरफ इतना घूमें कि दायीं दिशा भलीप्रकार दिखाई दे | फिर दायीं तरफ कमर को घुमाते हुए इतना मोड़ें कि बायीं दिशा दिखाई दे | जिस तरफ घूमेंगे उधर का हाथ फैला रहेगा और दूसरा हाथ मुड़ा रहेगा | पाँच – पाँच बार दोनों तरफ करें |

यह आसन करने में सुगम होते हुए भी इसके कई सारे लाभ हैं |



स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – नवम्बर २०१५ से 

Wednesday, October 7, 2015

उत्कटासन

लाभ : १) इस आसन के अभ्यास से पाँव और ऊँगलियों के जोड़ों का दर्द दूर होता हैं तथा जाँघों की मांसपेशियाँ पुष्ट होती है |

२) वीर्य का प्रवाह ऊर्ध्वगामी होता हैं | अखंड ब्रह्मचर्य के लिए उपयोगी है |

३) बवासीर की बीमारी में लाभ पहुँचता है |

४) इस आसन के समय उड्डीयान बंध करने से पेट के सभी विकारों में लाभ होता है |

विधि : पंजों के बल जमीन पर बैठ जायें | अँगूठों पर जोर देते हुए एडियों को भलीभाँति ऊपर उठायें | इसके बाद एडियों को आपस में मिलाते हुए गुदाद्वार को उन पर सटाकर रखें | अब दोनों हाथों की कोहनियों को घुटनों पर रखते हुए ऊँगलियों को परस्पर फँसा लें |



स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – अक्टूबर २०१५ से

Monday, September 7, 2015

सुखी, स्वस्थ रहने के सरल उपाय

१)     बच्चों को पढ़ा हुआ याद नहीं रहता हैं तो प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य दें,  ५ – ७ तुलसी के पत्ते खाकर आधा गिलास पानी पियें, जीभ तालू में लगा के पढ़े, कमर सीधी रख के बैठे, बुद्धि व मेधाशक्तिवर्धक प्रयोग आदि करें |

२)     धुप में नंगे सिर नहीं टहलना चाहिए | इससे आँख, नाक, कान व ज्ञानतंतुओं ( स्मरणशक्ति ) आदि की कार्यक्षमता को बहुत नुकसान होता है |

३)     रात को सिर पूर्व या दक्षिण की तरफ करके ही सोना चाहिए अन्यथा सिरदर्द, तनाव, चिंता पीछा नहीं छोड़ेंगे |

४)     घर में लड़ाई – झगड़े ज्यादा होते हो तो ‘हे प्रभु ! आनंददाता.... ‘ प्रार्थना पुरे परिवारसहित एक साथ बैठकर करें |

स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१५ से 

अनिद्रा से छुटकारा

१० मिनट विधिवत शवासन करने से या जीभ के अग्रभाग को दाँतो से थोडा दबाकर १० मिनट तक ज्ञान मुद्रा लगा के बैठने से शारीरिक – मानसिक तनाव व अनिद्रा आदि की बीमारी दूर होती है |


स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१५ से 

ह्रदयाघात ( हार्ट – अटैक ) का अचूक उपाय

एक चुटकी दालचीनी के चूर्ण को एक कप दूध में समभाग पानी मिलाकर तब तक उबालें, जब तक पानी वाष्पीभूत न हो जाय | फिर मिश्री मिलाकर पी लें, इससे ह्रदयाघात ( हार्ट – अटैक ) से सुरक्षा होगी और नाड़ियों के अवरोध ( ब्लॉकेज ) भी खुल जायेंगे |

स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१५ से 

झुलासन

लाभ : १) कमर पतली और सीना चौड़ा होता है |
२) कंधों और भुजाओं में बल बढ़ता है तथा कलाइयाँ मजबूत हो जाती है |
३) ह्दय को बल मिलता है |
४) इसके अभ्यासी को अत्यधिक परिश्रम करने पर भी थकान प्रतीत नहीं होती | उसकी पाचन – क्रिया भी ठीक होने लगती है |
५) इससे अधिक मात्रा में गंदी वायु बाहर निकल जाती है और शरीर के भीतर शुद्ध प्राणवायु भलीभाँति प्रविष्ट होने लगती हैं, जिससे सम्पूर्ण शरीर को अदभुत लाभ होता है |

विधि : आसन बिछाकर पद्मासन में बैठ जायें | दोनों हाथों की हथेलियाँ को जमीन पर रखकर समस्त शरीर को ऊपर उठा लें और झूले  के समान आगे – पिच्छे झूलें |

वैसे यह आसन सभी के लिए उपयोगी हैं परन्तु १६ वर्ष से कम आयुवालों के लिए अत्यधिक उपयोगी है |


स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१५ से 

Friday, August 7, 2015

आरोग्यरक्षक व उत्तम पथ्य – करेला

स्वस्थ व निरोग शरीर के लिए खट्टे, खारे, तीखे, कसैले और मीठे रस के साथ – साथ कडवे रस की भी आवश्यकता होती है | करेले में कडवा रस तो होता ही है, साथ ही यह अनेक गुणों को अपने भीतर सँजोये हुए हैं |

करेला पचने में हलका, रुचिकर, भूख, बढानेवाला, पाचक, पित्तनाशक, मल-मूत्र साफ़ लानेवाला, कृमिनाशक तथा ज्वरनाशक है | यह रक्त को शुद्ध करता हैं, रोगप्रतिकारक शक्ति एवं हीमोग्लोबिन बढ़ाता हैं | यकृत की बीमारियों एवं मधुमेह (डायबिटीज )  में अत्यंत उपयोगी है | चर्मरोग, सूजन, व्रण तथा वेदना में भी लाभदायी है | करेला कफ प्रक्रुतिवालों के लिए अधिक गुणकारी है | स्वास्थ्य चाहनेवालों को सप्ताह में एक बार करेले अवश्य खाने चाहिए |

गुणकारी करेले की सब्जी
सब्जी बनाते समय कडवाहट दूर करने के लिए करेले के ऊपरी हरे छिलके तथा रस नहीं निकालना चाहिए | इससे करेले  के गुण बहुत कम हो जाते हैं | कडवाहट निकाले बिना बनायी गयी सब्जी परम पथ्य है |

बुखार, आमवात, मोटापा, पथरी, आधासीसी, कंठ में सूजन, दमा, त्वचा-विकार, अजीर्ण, बच्चों के हरे-पीले दस्त, पेट के कीड़े, मूत्ररोग एवं कफजन्य विकारों में करेले की सब्जी लाभप्रद है |

करेले के औषधीय प्रयोग
मधुमेह ( डायबिटीज ) : आधा किलो करेले काटकर १ तसले में ले के सुबह आधे घंटे तक पैरों से कुचलें | १५ दिन तक नियमित रूप से यह प्रयोग करने से रक्त – शर्करा (ब्लड शुगर) नियंत्रित हो जाती है | प्रयोग के दिनों में करेले की सब्जी खाना विशेष लाभप्रद है |

तिल्ली व यकृत वृद्धि :
१] करेले का रस २० मि.ली., राई का चूर्ण ५ ग्राम, सेंधा नमक ३ ग्राम -  इन  सबको मिलाकर सुबह खाली पेट पीने से तिल्ली व यकृत (लीवर ) वृद्धि में लाभ होता है |
२] आधा कप करेले के रस में आधा कप पानी व २ चम्मच शहद मिलाकर प्रतिदिन सुबह – शाम पियें |

रक्ताल्पता : करेलों अथवा करेले के पत्तों का २ – २ चम्मच रस सुबह – शाम लेने से खून की कमी में लाभ होता हैं |

मासिक की समस्या : मासिक कम आने या नहीं आने की स्थिति में करेले का रस ४० मि. ली. दिन में २ बार लें | अधिक मासिक में करेले का सेवन नहीं करना चाहिए |

गठिया : करेले या करेले के पत्तों का रस गर्म करके दर्द और सूजनवाले स्थान पर लगाने व करेले की सब्जी खाने से आराम मिलता हैं |

तलवों में जलन : पैर के तलवों में होनेवाली जलन में करेले का रस लगाने या करेला घिसने से लाभ होता हैं |
विशेष : करेले का रस खाली पेट पीना अधिक लाभप्रद हैं | बड़े करेले की अपेक्षा छोटा करेला अधिक गुणकारी होता हैं |

सावधानियाँ : जिन्हें आँव की तकलीफ हो, पाचनशक्ति कमजोर हो,मल के साथ रक्त आता हो, बार – बार मुँह में छाले पड़ते हों तथा जो दुर्बल प्रकृति के हों उन्हें करेले का सेवन नहीं करना चाहिए | करेले कार्तिक मास में वर्जित हैं |


स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – अगस्त २०१५ से   

पाचन – संस्थान के रोगों का एक्यूप्रेशर द्वारा इलाज – दस्त या अतिसार में एक्यूप्रेशर चित्किसा

दस्त के एक्यूप्रेशर बिंदु :
मुख्य बिंदु : नाभि के ठीक चार अंगुल नीचे स्थित बिंदु ( चित्र १ में बिंदु ‘अ’ )

छाती की बीचवाली हड्डी के नीचेवाले छोर और नाभि के ठीक बीच में स्थित बिंदु ( चित्र १ में बिंदु ‘ब’ )
दोनों हथेलियाँ में दूसरी और तीसरी ऊँगली के मध्य चित्र २ में दर्शाये गये भाग पर ऊँगलियों के जोड़ से हाथ की कलाई की ओर हथेली के ठीक मध्य तक रगड़ते हुए हलका दबाव दें | इस प्रकार एक हाथ में ५ से ७ बार करें | दबाव पेन, पेन्सिल के पीछेवाले भाग या अँगूठे से दिया जा सकता हैं | एक्यूप्रेशर करने से पहले हथेली पर २ – ४ बूँद तेल या टेलकम पाउडर लगा लेने से एक्यूप्रेशर अच्छी तरह से होता है |

सहायक बिंदु : हाथों व पैरों के अँगूठे व प्रथम ऊँगली के बीचवाले मांसल भाग पर स्थित बिंदु |
उक्त चित्रों में दर्शाये गये बिन्दुओं पर ५ से १० सेकंड तक दबाव दें, फिर छोड़ दें, फिर दबाव दें | ऐसा २ से ३ मिनट तक दिन में ३ बार करें |
सीधे लेटकर दोनों पैरों के नीचे टखने के पास गरम पानी की थैली या काँच की बोतल में गरम पानी भरकर चित्र ४ में दर्शाये अनुसार १५ से २० मिनट के लिए रखें | इससे दस्त में जल्दी लाभ होता हैं और शरीर की थकान भी दूर होती है | यह प्राकृतिक चिकित्सा का अनुभूत प्रयोग हैं |

दस्त सामान्यत: अत्यधिक या अनुचित अथवा दूषित आहार तथा दूषित पानी के कारण होते हैं | दस्त होने पर पेडू पर गर्म पानी की थैली से ५ – ७ मिनट सेंक करें | भोजन में पतली खिचड़ी लें | दही के ऊपर का पानी २ चम्मच पीना लाभदायी है | दूध, फल या फलों का रस तथा पचने में भारी प्रदार्थ नहीं लेने चाहिए | कुटज घनवटी की ४ – ४ गोलियाँ दिन में ३ – ४ बार लेने से दस्त बंद हो जाते हैं |

दस्त लगने पर प्रार्थमिक उपचार विपरीतकरणी मुद्रा तुरंत चालू करें | समय पर वैद्यकीय सलाह बहुत जरूरी हैं क्योंकि ज्यादा दस्त लगने पर बच्चों व वृद्धों की जान को खतरा हो सकता हैं |

                       स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१५ से  

Friday, July 10, 2015

निरोगी व तेजस्वी आँखों के लिए

आँख हमारे शरीर के सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व कोमल अंगों में से एक है | वर्तमान समय में आँखों की समस्याओं से बहुत लोग ग्रस्त देखे जाते हैं , जिनमे विद्यार्थियों की भी बड़ी संख्या है | निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाय तो आँखों को जीवनभर स्वस्थ रख सकते हैं और चश्मे से भी छुटकारा पा सकते हैं |

आँखों के लिए हानिकारक

o कम प्रकाश में, लेटे –लेटे व चलते वाहन में पढना आँखों के लिए बहुत हानिकारक हैं |

o मोबाइल, टीवी, लैपटॉप, कम्प्यूटर आदि की स्क्रीन को अधिक समय तक लगातार देखने व हेयरड्रायर के उपयोग से आँखों को बहुत नुकसान होता है |

o आँखों को चौंधिया देनेवाले अत्यधिक तीव्र प्रकाश में देखना, ग्रहण के समय सूर्य या चन्द्रमा को देखना आँखों को हानि पहुँचता है |

o सूर्योदय के बाद सोये रहने, दिन में सोने और रात में देर तक जागने से आँखों पर तनाव पड़ता है और धीरे-धीरे आँखों की रोशनी कम तथा वे रुखी व तीखी होने लगती है |

o तेज रफ्तार की सवारी के दौरान आँखों पर सीधी हवा लगने से तथा मल-मूत्र और अधोवायु के वेग को रोकने एवं ज्यादा देर तक रोने आदि से आँखें कमजोर होती है |

o सिर पर कभी भी गर्म पानी न डालें और न ही ज्यादा गर्म पानी से चेहरा धोया करें |

o खट्टे, नमकीन, तीखे, पित्तवर्धक पदार्थों का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए |

नेत्र - रक्षा के उपाय

o पढ़ते समय ध्यान रखें कि आँखों पर सामने से रोशनी नहीं आये, पीठ के पीछे से आये, आँख तथा पुस्तक के बीच की दूरी ३० से.मी. से अधिक हो | पुस्तक आँखों के सामने नहीं, नीचे की ओर हो | देर रात तक पढने की अपेक्षा प्रात: जल्दी उठकर पढ़ें |

o तेज धूप में धूप के चश्मे या छाते का उपयोग करें | धूप में से आकर गर्म शरीर पर तुरंत ठंडा पानी न डालें |

o चन्द्रमा व हरियाली को देखना आँखों के लिए विश्रामदायक हैं |

o सुबह हरी घास पर १५ – २० मिनट तक नंगे पैर टहलने से आँखों को तरावट मिलती है | (ऋषिप्रसाद – अक्टूबर २०१४, पृष्ठ २७ पर दिये गये नेत्र-सुरक्षा के उपायों का भी लाभ लें|)

कुछ विशेष प्रयोग

o अंजन : प्रतिदिन अथवा कम-से- सप्ताह में एक बार शुद्ध काले सुरमे (सौवीरांजन) से अंजन करना चाहिए | इससे नेत्ररोग विशेषत: मोतियाबिंद का भय नहीं रहता |

o जलनेति : विधिवत जलनेति करने से नेत्रज्योति बढती है | इससे विद्यार्थियों का चश्मा भी छूट सकता हैं | (विधि हेतु आश्रम की पुस्तक ‘योगासन’ का पृष्ठ ४३ देखें )

o नेत्रों के लिए विशेष हितकर पदार्थ : आँवला, गाय का दूध व घी, शहद, सेंधा नमक, बादाम, सलाद, हरी सब्जियाँ – विशेषत: डोडी की सब्जी, पालक, पुनर्नवा, हरा धनिया, गाजर, अंगूर, केला, संतरा, मुलेठी, सौंफ, गुलाबजल, त्रिफला चूर्ण |

o सर्वांगासन नेत्र-विकारों को दूर करने और नेत्रज्योति बढ़ानेवाला सर्वोत्तम आसन है | (आश्रम की पुस्तक ‘योगासन’ का पृष्ठ १५ देखें |)

- स्त्रोत – लोककल्याण सेतु – जून २०१५ से

यशप्राप्ति का अदभुत मंत्र

कौनसा भी कार्य की शुरवात करने से पहिले – ‘नारायण ... नारायण ..., नारायण ..., नारायण ...’ इसी मंत्र का सभी नर - नारी में छूपी सर्वव्यापक परमात्मा के नामस्मरण या उच्चारण करनेवालों को यश अवश्य मिलता है |

- ऋषिप्रसाद (विशेषांक) –मई २०१५ से

Tuesday, July 7, 2015

विपरीतकरणी मुद्रा

इस आसन के नियमित व विधिवत अभ्यास से प्राणों के प्रवाह में सूक्ष्म परिवर्तन आता हैं | मणिपुर चक्र से प्राणशक्ति का प्रवाह प्रचुर मात्रा में विशुद्धाख्य चक्र की ओर होता है | इस प्रकार समस्त सूक्ष्म शरीर के शुद्धिकरण में सहायता मिलती हैं | इसका नियमित अभ्यास कई बीमारियों को रोकता हैं | यह ओजशक्ति को ऊपर के केन्द्रों में ले जाने की एक महत्त्वपूर्ण मुद्रा हैं | महर्षि घेरंड के अनुसार जो नित्यप्रति इसकी साधना करता हैं, वह बुढापे पर विजय प्राप्त करता हैं | इसके अभ्यास से प्राय: सर्वांगासन व शीर्षासन से होनेवाले सभी लाभ होते हैं |

लाभ : १) गले को तथा उसके ऊपर के अंगों को अधिक मात्रा में शुद्ध रक्त की प्राप्ति होती है |
२) मस्तिष्क में विशेषकर प्रमस्तिष्क आवरण ( सेरेब्रल काँर्टक्स ) तथा पीयूष ( पिट्यूटरी ) ग्रंथि एवं शीर्ष ( पीनियल ) ग्रंथि में रक्त का संचार बढ़ जाता है | प्रमस्तिष्क की अक्षमता तथा बुढापे के कारण होनेवाला मनोभ्रंश प्रभावहीन होते हैं तथा मानसिक सतर्कता बढती है |
३) स्नायविक दुर्बलता दूर होती है |
४) सफेद बाल काले होने लगते हैं और चेहरे की झुरियाँ दूर होकर नवयौवन प्राप्त होता है |
५) अल्पक्रियाशील थायराँइड संतुलित बनती है तथा सर्दी – जुकाम, गले की सूजन व श्वसन – संबंधी रोगों से बचाव होता है |
६) भूख व पाचन – क्रिया बढती हैं तथा कब्ज के उपचार में मदद मिलती हैं |
७) यह बवासीर एवं हर्निया के उपचार में सहायक है |
८) महिलाओं का बाँझपन और मासिक धर्म संबंधी विकार दूर होते हैं |

विधि : जमीन पर कम्बल बिछाकर शवासन में लेट जायें | दोनों पैरों को एक साथ धीरे – धीरे ऊपर उठायें | कमर को हथेलियों से सहारा देकर ऊपर उठायें | गर्दन से कमर तक का भाग जमीन से ४५ डिग्री पर ऊपर रखें तथा पैरों को सीधा रखते हुए सिर की ओर उतना ही झुकायें जिससे पैर दृष्टि की सीध में आ जायें | जीभ से तालू का स्पर्श करें | पैर के अँगूठों  पर दृष्टि एकाग्र करें अथवा ध्यान मणिपुर (नाभि) केंद्र में रखें |

आरम्भिक स्थिति में लौटने के लिए पैरों को सिर की ओर झुकायें, फिर धीरे – धीरे मेरुदंड को नीचे लायें तथा घुटने मोड बिना धीरे – धीरे पैरों को नीचे लायें | कुछ देर शवासन में लेटे रहें |

विपरीतकरणी मुद्रा का अभ्यास प्रतिदिन एक ही समय पर प्रात:काल करना लाभप्रद हैं |  प्रथम दिन कुछ सेकंड तक अभ्यास करें | धीरे – धीरे अवधि बढाते हुए १० – १५ मिनट तक कर सकते हैं | अपने नित्य योगाभ्यास के अंत में तथा ध्यान के पूर्व इसका अभ्यास करें |

सावधानियाँ : भोजन के कम – से – कम तीन घंटे बाद तक इसका अभ्यास न करें | उच्च रक्तचाप, ह्रदयरोग, थायराँइड अभिवृद्धि या शरीर में विषाक्त तत्त्वों की वृद्धि होने पर यह आसन न करें | गर्भवती महिलाओं व १४ वर्ष से कम आयु के बालकों को यह आसन नहीं करना चाहिए |


    स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१५ से  

Friday, June 12, 2015

युवाओं व विद्यार्थियों हेतु विशेष

>> अनिद्रा अथवा अतिनिद्रा, कमजोर याददाश्त, क्रोधी स्वभाव आदि को दूर करने के लिये लोग डॉक्टरों व दवाइयों की गुलामी करने के बाद भी सफल नहीं हो पाते | इन समस्याओं को दूर करने का आसान व बिना खर्च का उपाय है ‘ज्ञान मुद्रा’ | इससे पूजा-पाठ, ध्यान-भजन में मन लगता है तथा एकाग्रता में भी वृद्धि होती है | [विस्तृत जानकारी हेतु पढ़े, आश्रम द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘जीवनविकास’, पृष्ठ- ८४ ]

>> जल्दी सोयें, जल्दी उठें | रात्रि ९ बजे से प्रात: ३ या ४ बजे तक की प्रगाढ़ निद्रा से ही आधे रोग ठीक हो जाते है | अर्धरोगहरी निद्रा ...

>> एकाग्रता के विकास का आसान व कारगर तरीका है ‘त्राटक’ | आसन पर बैठकर इष्टपूर्ति, सदगुरुदेव, दीपज्योति आदि को बिना पलक झपकाये एकटक देखते रहें | इससे नेत्रज्योति बढाने में विशेष लाभदायी है |




>> जिन विद्यार्थियों ( १८ वर्ष से कम उम्र) का कद नही बढ़ता, वे पुलअप्स का अभ्यास करें और बेल के ६ पत्ते व २ – ४ काली मिर्च हनुमानजी का स्मरण करते हुए चबाकर खायें | इनको पानी के साथ पीसकर भी खा सकते है |

>> यादशक्ति बढाने, मन की दुर्बलता मिटाने तथा शरीर में शक्ति बढ़ाने के लिए ४ – ५ काजू शहद के साथ खूब चबा के प्रतिदिन खाने चाहिए | बच्चों को २ से ५ काजू खाने चाहिए |

>> ताड़ासन करने से प्राण ऊपर के केन्द्रों में चले जाते हैं, इससे स्वप्नदोष, वीर्य-विकार, धातुक्षय जैसी बीमारियों में लाभ होता है | कद-वृद्धि में मदद मिलती है |




विधि : आसन पर सीधे खड़े होकर हाथ ऊँचे उठा के पंजों के बल पर खड़े रहें एवं दृष्टि ऊपर की ओर रखें | यह आसन दिन में २ – ३ बार ५ – १० मिनट तक कर सकते है |

  >> क्रोधी स्वभाव पर नियंत्रण पाने, निर्णयशक्ति बढ़ाने तथा आज्ञाचक्र के विकास में शशकासन बहुत लाभदायी है | वज्रासन में बैठ के सिर को जमीन पर लगायें और हाथों को नमस्कार की स्थिति में जोड़ दें |





                                                                                                - लोककल्याणसेतु – जून – २०१५ से

पूज्य बापूजी की – स्वास्थ्य की अनुपम युक्तियाँ

Cancer के रोगी को १० ग्राम तुलसी का रस तथा १० ग्राम शहद मिलाकर सुबह – दोपहर - शाम देने से अथवा १० ग्राम तुलसी का रस एवं ५० ग्राम ताजा दही (खट्टा नहीं ) देने से उसे राहत मिलती है | एक – एक घंटे के अंतर से दो – दो तुलसी के पत्ते भी मूँह में रखकर चूसते रहें |

सुबह – दोपहर – शाम दही व तुलसी का रस कैंसर मिटा देता है (सूर्यास्त के बाद दही नहीं खाना चाहिए ) | ‘वज्र रसायन’ की आधी गोली दिन में २ बार लें | नींबू के छिलके चाक़ू से निकाल के उनके छोटे – छोटे टुकड़े कर लें | अथवा नींबू को फ्रीजर में रखें और सख्त हो जाने पर उसके छिलके को कद्दूकश किये छिलकों को दाल, सब्जी, सलाद, सूप आदि खाद्य पदार्थों में मिला के नियमित सेवन करने से कैंसर रोग में लाभ होता है | १ दिन के लिए १ नींबू का छिलका पर्याप्त है |

 >> एक चुटकी दालचीनी के चूर्ण को एक कप दूध में समभाग पानी मिलाकर तब तक उबालें, जब एक पानी वाष्पीभूत न हो जाय | फिर मिश्री मिलाकर पी लें, इससे ह्रदयाघात (हार्ट-अटैक) से सुरक्षा होगी और नाड़ियाँ के अवरोध (ब्लाँकेज) भी खुल जायेंगे |

>> १० मिनट विधिवत शवासन करने से या जीभ के अग्रभाग को दाँतो से थोडा दबाकर १० मिनट तक ज्ञान मुद्रा लगा के बैठने से शारीरिक-मानसिक तनाव व अनिद्रा आदि की बीमारी दूर होती है |

>> बच्चों को पढ़ा हुआ याद नहीं रहता है तो प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य दें, ५ – ७ तुलसी के पत्ते खाकर आधा गिलास पानी पियें, जीभ तालू में लगा के पढ़ें, कमर सीधी रख के बैठे, बुद्धि व मेधाशक्तिवर्धक प्रयोग आदि करें |

>> व्यवस्थित सुखासन में (पलथी मार के ) बैठकर ही भोजन करना चाहिए | खड़े हो के भोजन करना व पानी पीना हानिकारक है | बैठकर और चुस्की लेते हुए पानी पिये |

>> धुप में नंगे सिर नही टहलना चाहिए | इससे आँख, नाक, कान व ज्ञानतंतुओं (स्मरणशक्ति) आदि की कार्यक्षमता को बहुत नुकसान होता है |

>> रात को सिर पूर्व या दक्षिण की तरफ करके ही सोना चाहिए अन्यथा सिरदर्द, तनाव, चिंता पीछा नहीं छोंड़ेंगे |

>> घर में लड़ाई – झगड़े ज्यादा होते हों तो ‘हे प्रभु ! आनंददाता ...’ प्रार्थना पुरे परिवारसहित एक साथ बैठकर करें | (आश्रम के पुस्तक ‘हम भारत के लाल है’ पृष्ठ – ५७ )

>> एकादशी के दिन भूलकर भी चावल नहीं खायें, न किसीको खिलायें, अन्न भी नहीं खायें, न खिलायें | फल, दूध या छाछ, नींबू – शिंकजी पी सकते है | उपवास में उपयोग की जानेवाली सब्जियाँ ले सकते हैं |

>> सिर पर बाजारू शैम्पू – साबुन लगाने से ज्ञानतंतु कमजोर होते हैं | बालों की जड़ें भी कमजोर होती हैं व बाल झड़ते हैं | आँवले का रस लगाने से बालों की जड़ें मजबूत होती हैं एवं उनका झड़ना बंद हो जाता है | मुलतानी मिटटी या सप्तधान्य उबटन से स्नान साबुन व शैम्पू से १०० गुना हितकारी है |

                                                                                              - लोककल्याणसेतु – जून – २०१५ से

आरती में कपूर का उपयोग


कपूर – दहन में बाह्य वातावरण को शुद्ध करने की अदभुत क्षमता है | इसमें जीवाणुओं, विषाणुओं तथा सूक्ष्मतर हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने की शक्ति है | घर में नित्य कपूर जलाने से घर का वातावरण शुद्ध रहता है, शरीर पर बीमारियों का आक्रमण आसानी से नहीं होता, दु:स्वप्न नहीं आते और देवदोष तथा पितृदोषों का शमन होता है |

                                                                                       लोककल्याणसेतु – जून – २०१५ से

Wednesday, April 15, 2015

एलोवेरा जेल

लाभ : यह त्वचा को मुलायम व कोमल बनाकर उसमें निखार लाता हैं तथा अल्ट्रावाँयलेट किरणों के प्रदुषण व त्वचा-उत्तेजकोण आदि से होनेवाले हानिकारक प्रभाव से सुरक्षा प्रदान करता हैं | इसके उपयोग से किल-मुँहासे, काले दाग-धब्बे, निशान, दरारें व झुरियों से रक्षा होती हैं | यह रुखी और तैलीय त्वचा – दोनों के लिए उपयोगी हैं |
 
  त्वचा को पानी से धोने के बाद हलके हाथों से लगायें |

(सभी संत श्री आशारामजी आश्रम व समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध )

 लोककल्याणसेतु – मार्च – २०१५ से

गर्मी में विशेष लाभकारी – पुदीना

पुदीना गर्मियों में विशेष उपयोगी एक सुगंधित औषध है | यह रुचिकर, पचने में हलका, तीक्ष्ण, ह्रदय-उत्तेजक, विकृत कफ हो बाहर लानेवाला, गर्भाशय-संकोचक बी चित्त को प्रसन्न करनेवाला हैं | पुदीने के सेवन से भूख खुलकर लगती है और वायु का शमन होता हैं | यह पेट के विकारों में विशेष लाभकारी है | श्वास, मुत्राल्पता तथा त्वचा के रोगों में भी यह उपयुक्त हैं |

औषधि प्रयोग

१] पेट के रोग : अपच, अजीर्ण, अरुचि, मंदाग्नि, अफरा, पेचिश, पेट में मरोड़, अतिसार, उलटियाँ, खट्टी डकारें आदि में पुदीने के रस में जीरे का चूर्ण व आधे नींबू का रस मिलाकर पीने से लाभ होता है |

२] मासिक धर्म : पुदीने को उबालकर पीने से मासिक धर्म की पीड़ा तथा अल्प मासिक स्राव में लाभ होता हैं | अधिक मासिक स्त्राव में यह प्रयोग न करें |

३] गर्मियों में : गर्मी के कारण व्याकुलता बढने पर एक गिलास ठंडे पानी में पुदीने का रस तथा मिश्री मिलाकर पीने से शीतलता आती है |

४] पाचक चटनी :
ताजा पुदीना, काली मिर्च, अदरक, सेंधा नमक, काली द्राक्ष और जीरा – इन सबकी चटनी बनाकर उसमें नींबू का रस निचोड़कर खाने ने रूचि उत्पन्न होती है, वायु दूर होकर पाचनशक्ति तेज होती है | पेट के अन्य रोगों में भी लाभकारी है |

५] उलटी-दस्त, हैजा : पुदीने के रस में नींबू का रस, अदरक का रस एवं शहद मिलाकर पिलाने से लाभ होता है |

६] सिरदर्द : पुदीना पीसकर ललाट पर लेप करें तथा पुदीने का शरबत पियें |

७] ज्वर आदि : गर्मी में जुकाम, खाँसी व् ज्वर होने पर पुदीना उबाल के पीने से लाभ होता हैं |

८] नकसीर : नाक में पुदीने के रस की ३ बूँद डालने से रक्तस्त्राव बंद हो जाता हैं |

९] मूत्र-अवरोध : पुदीने के पत्ते और मिश्री पीसकर १ गिलास ठंडे पानी में मिलाकर पियें |

१०] गर्मी की फुंसियाँ : समान मात्रा में सूखा पुदीना एंव मिश्री पीसकर रख लें | रोज प्रात: आधा गिलास पानी में ४ चम्मच मिलाकर पियें |

११] हिचकी :पुदीने या नींबू के रस-सेवन से राहत मिलती हैं |

मात्रा : रस -५ से २०० मि.ली.| अर्क – १० से २० मि.ली. (उपरोक्त प्रयोगों में पुदीना रस की जगह अर्क का भी उपयोग किया जा सकता है ) | पत्तों का चूर्ण – २ से ४ ग्राम (चूर्ण बनाने के लिए पत्तों का छाया में सुखाना चाहिये ) |

- लोककल्याणसेतु – मार्च – २०१५ से

Tuesday, March 24, 2015

स्वाइन फ्लू से सुरक्षा

स्वाइन फ्लू एक संक्रामक बीमारी हैं, जो श्वसन-तंत्र को प्रभावित करती है |

लक्षण – नाक ज्यादा बहना, ठंठ लगना, गला खराब होना, मांसपेशियों में दर्द, बहुत ज्यादा थकान, तेज सिरदर्द, लगातार खाँसी, दवा खाने के बाद भी बुखार का लगातार बढ़ना आदि |

सावधानियाँ –


- लोगों से हाथ-मिलाने, गले लगाने आदि से बचें | अधिक भीडवाले थिएटर जैसे बंद स्थानों पर जाने से बचें |

- बिना धुले हाथों से आँख, नाक या मुँह छूने से परहेज करें |

- जिनकी रोगप्रतिकारक क्षमता कम हो उन्हें विशेष सावधान रहना चाहिए |

- जब भी खाँसी या छींक आये तो रुमाल आदि का उपयोग करें |

स्वाइन फ्लू से कैसे बचें ?


यह बीमारी हो तो इलाज से कुछ ही दोनों में ठीक हो सकती है, दरें नहीं | प्रतिरक्षा व श्वसन तन्त्र को मजबूत बनायें व इलाज करें |

पूज्य बापूजी द्वारा बतायी गयी जैविक दिनचर्या से प्रतिरक्षा तन्त्र मजबूत होता है | सुबह 3 से 5 बजे के बीच में किये गये प्राणायाम से श्वसन तन्त्र विशेष बलशाली बनता है | घर में गौ-सेवा फिनायल से पोछा लगाये व् गौ-चन्दन धूपबत्ती पर गाय का घी, डाल के धुप करें | कपूर भी जलाये | इससे घर का वातावरण शक्तिशाली बनेगा | बासी, फ्रिज में रखी चीजें व बाहर के खाने से बचें | खुलकर भूख लगने पर ही खायें | सूर्यस्नान, सूर्यनमस्कार, आसन प्रतिदिन करें | कपूर, इलायची व तुलसी के पत्तो को पतले कपड़े में बाँधकर बार-बार सूंघें | तुलसी के 5 - 7 पत्ते रोज खायें | आश्रमनिर्मित होमियों तुलसी गोलियाँ, तुलसी अर्क, संजीवनी गोली से रोगप्रतिकारक क्षमता बढती है |

कुछ वर्ष पहले जब स्वाइन फ्लू फैला था, तब पूज्य बापूजी ने इसके बचाव का उपाय बताया था : ‘ नीम की 21 डंठलियाँ (जिनमें पत्तियाँ लगती हैं, पत्तियाँ हटा दें ) व 4 काली मिर्च पानी डालकर पीस लें और छान के पिला दें | बच्चा हैं तो 7 डंठलियाँ व सवा काली मिर्च दें |’

स्वाइन फ्लू से बचाव के कुछ अन्य उपाय

- 5 – 7 तुलसी पत्ते, 10 - 12 नीमपत्ते, 2 लौंग, 1 ग्राम दालचीनी चूर्ण, 2 ग्राम हल्दी, 200 मि.ली. पानी में डालकर उबलने हेतु रख दें | उसमें 4 - 5 गिलोय की डंडियाँ कुचलकर डाल दें अथवा 2 से 4 ग्राम गिलोय चूर्ण मिलाये | 50 मि.ली. पानी शेष रहने पर छानकर पिये | यह प्रयोग दिन में 2 बार करें | बच्चों को इसकी आधी मात्रा दें |

- दो बूँद तेल नाक के दोनों नथुनों के भीतर ऊँगली से लगाये | इससे नाक की झिल्ली के ऊपर तेल की महीन परत बन जाती हैं, जो एक सुरक्षा-कवच की तरह कार्य करती हैं, जिससे कोई भी विषाणु, जीवाणु तथा धुल-मिटटी आदि के कण नाक की झिल्ली को संक्रमित नहीं कर पायेंगे |

- स्वाइन फ्लू के लिए विशेष रूप से बनायी गयी आयुर्वेदिक औषधी (सुरक्षा चूर्ण व सुरक्षा वटी) संत श्री आशारामजी औषधी केन्द्रों पर उपलब्ध हैं | सम्पर्क करें : 09227033056

- स्वाइन फ्लू से बचाव की होमियोपैथिक दवाई हेतु सम्पर्क करे : 09541704923

(यदि किसी को स्पष्ट रूपसे रोग के लक्षण दिखाई दें तो वैद्य या डॉक्टर से सलाह लें |)

- ऋषिप्रसाद – मार्च – २०१५ से